Retainer और per-filing में असली फर्क क्या है?
Per-filing में आप हर काम के लिए अलग से पूछते हो और अलग से pay करते हो। Retainer में एक fixed monthly fee होती है, scope पहले से fix होता है, और deadline track करना हमारी ज़िम्मेदारी बन जाती है। जिनके पास हर महीने काम निकलता है, उनके लिए retainer सस्ता और आसान पड़ता है।
बीच में plan बदल सकते हैं?
हाँ। Business बढ़ने पर ऊपर वाले tier में जा सकते हो, और अगर scope कम हो जाए तो नीचे भी। एक महीने का notice काफी है।
पुराना CA छोड़ना ज़रूरी है?
नहीं। कुछ client सिर्फ GST या सिर्फ payroll हमें देते हैं और बाकी अपने CA के पास रखते हैं। जो scope आप देते हो, सिर्फ उसी की ज़िम्मेदारी हम लेते हैं — और वो engagement letter में साफ़ लिखा होता है।
अगर notice आ गया तो?
R3 से ऊपर वाले plans में पहले level का reply शामिल है। बड़े matters — जैसे assessment, appeal या representation — अलग से quote होते हैं, काम शुरू करने से पहले।
हम दूसरे state में हैं, चलेगा?
हाँ। Documents WhatsApp या email पर, बात call पर — लगभग पूरा काम online हो जाता है। हम Haryana, Delhi, UP, Rajasthan और Punjab regularly serve करते हैं, और PAN India उपलब्ध हैं।
जो price लिखी है वही final fee होती है?
Price “से शुरू” है, क्योंकि एक ही tier के अंदर काम बहुत अलग हो सकता है — transactions की संख्या, states, employees। Call पर actual scope देख कर एक fixed number बताते हैं, और वही engagement letter में आता है। उसके बाद कोई hidden charge नहीं।