रिकवरी सूट
पैसा, invoice या एडवांस
- दस्तावेज़ और समय सीमा की जाँच
- समरी या रेगुलर सूट
- कमर्शियल कोर्ट जहाँ लागू हो
- डिक्री और निष्पादन
काम का दायरा देखकर तय कीमत
फोरम, स्टेज और सुनवाई के हिसाब से — काम शुरू होने से पहले लिखित में
सिविल लिटिगेशन · एडवोकेट्स
रिकवरी हो, प्रॉपर्टी का झगड़ा हो या बिज़नेस कॉन्ट्रैक्ट — सिविल केस में सबसे ज़रूरी है सही कोर्ट, सही राहत और लिमिटेशन के अंदर filing। प्लीडिंग्स से लेकर बहस तक, डॉक्यूमेंट्स और अकाउंट्स की समझ के साथ।
काम में क्या शामिल है
काम
फीस कोर्ट, स्टेज और सुनवाई पर निर्भर करती है — काम शुरू होने से पहले लिखित में तय होती है।
पैसा, invoice या एडवांस
काम का दायरा देखकर तय कीमत
फोरम, स्टेज और सुनवाई के हिसाब से — काम शुरू होने से पहले लिखित में
टाइटल, कब्ज़ा, बँवारा, किराया
काम का स्कोप देखकर फिक्स्ड फीस
फोरम, स्टेज और सुनवाई के हिसाब से — काम शुरू होने से पहले लिखित में
आपके खिलाफ मुकदमा
काम का स्कोप देखकर फिक्स्ड फीस
फोरम, स्टेज और सुनवाई के हिसाब से — काम शुरू होने से पहले लिखित में
Bar Council of India के नियमों के अनुसार यह पेज सिर्फ जानकारी के लिए है; इसे विज्ञापन या सोलिसिटेशन न समझा जाए। हर मामले के तथ्य अलग होते हैं — किसी भी परिणाम की गारंटी नहीं दी जाती।
ज्यादातर सिविल दावों के लिए 3 साल की समय सीमा होती है। देरी से हक खत्म हो सकता है — इसलिए तारीखों का ध्यान रखें।
रिकवरी और कमर्शियल केस में हिसाब ही सबूत है। CA टीम साथ होने से क्लेम और लेजर मजबूत बनते हैं।
स्कोप
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, कमर्शियल कोर्ट, कंज्यूमर कमीशन और ट्रिब्यूनल — दिल्ली (रोहिणी) और हरियाणा।
बकाया invoice, लोन और एडवांस — Order 37 समरी सूट भी।
तय वैल्यू के कमर्शियल विवाद — प्री-इंस्टीट्यूशन मीडिएशन के साथ।
ओनरशिप और पजेशन का डिक्लेरेशन।
पारिवारिक प्रॉपर्टी का बंटवारा।
कंस्ट्रक्शन, ट्रांसफर या इस्तेमाल रोकने के लिए।
किरायेदार और मकान मालिक के विवाद।
डिस्ट्रिक्ट, स्टेट और नेशनल कमीशन।
मेंटेनेंस, कस्टडी और तलाक (आपसी और विवादित)।
डिक्री के बाद असली रिकवरी।
ये बातें पहले से जान लीजिए
कमर्शियल विवादों में बिना किसी अर्जेंट रिलीफ के, केस से पहले मीडिएशन जरूरी है।
रिकवरी और प्रॉपर्टी सूट में कोर्ट फीस क्लेम वैल्यू पर लगती है — स्टेट के हिसाब से।
लोक अदालत और मीडिएशन से कई केस जल्दी सुलझते हैं — हम यह विकल्प हमेशा देखते हैं।
प्रक्रिया
तथ्य, दस्तावेज और समय सीमा।
notice, मीडिएशन या सीधा मुकदमा।
वाद पत्र / लिखित बयान और आवेदन।
सबूत, बहस और डिक्री।
दस्तावेज
सिविल केस के लिए: यह लिस्ट तैयार रखिए। फोटो या स्कैन WhatsApp पर भेज दीजिए — ओरिजिनल सिर्फ ज़रूरत पड़ने पर। केस के हिसाब से लिस्ट थोड़ी बदल सकती है।
यह कोर्ट और केस के प्रकार पर निर्भर करता है — कुछ महीनों से लेकर कई साल तक। Summary suits और mediation से समय कम हो सकता है।
नहीं। आपकी ज़्यादातर तारीखों पर Advocate ही पेश होते हैं; आपकी ज़रूरत सिर्फ सबूत के समय होती है।
अगर लिखित एग्रीमेंट, invoice और रसीद हो तो summary suit एक तेज़ रास्ता है। चेक के मामले में Section 138 भी किया जा सकता है।
दिल्ली और हरियाणा के कोर्ट में; बाकी जगहों पर सहयोगी वकीलों के साथ।
नहीं। हम आपके केस की मज़बूती और जोखिम दोनों के बारे में साफ़ बताते हैं।
और भी
विवाद का विवरण और दस्तावेज़ भेजें — हमारी टीम इन्हें देखकर आपसे बात करेगी।