Mutual consent
जहाँ दोनों सहमत हैं
- Settlement terms की drafting
- Joint petition
- First और second motion
- Waiting period waiver application (जहाँ बने)
Consultation के बाद fixed quote
Scope लिखित में
Advocate · फैमिली लॉ
Divorce, maintenance, custody या घरेलू हिंसा — फैमिली मैटर्स में कानून के साथ समझदारी भी चाहिए। हम mutual consent divorce से लेकर contested cases, maintenance, custody, domestic violence और settlement तक — पूरी गोपनीयता के साथ, आपके और बच्चों के हित को पहले रखकर काम करते हैं।
काम में क्या शामिल है
Fees
Professional fee मामले के प्रकार, कोर्ट और hearings की संख्या पर निर्भर करती है — consultation के बाद लिखित में।
जहाँ दोनों सहमत हैं
Consultation के बाद fixed quote
Scope लिखित में
जहाँ सहमति नहीं
Consultation के बाद fixed quote
Stage के हिसाब से — काम से पहले लिखित में
कई cases एक साथ
Consultation के बाद fixed quote
Matters की संख्या के हिसाब से
इस पेज पर दी गई जानकारी सामान्य जानकारी है, professional advice नहीं। स्थितियां तथ्यों और उस समय के कानून पर निर्भर करती हैं — अपने केस के लिए हमसे बात कर लीजिए।
Alimony और maintenance में इनकम, ITR और एसेट्स का सही हिसाब — CA और Advocate एक फाइल पर।
जहाँ मुमकिन हो, mediation से — कम खर्च, कम समय और बच्चों पर कम असर।
Scope
दोनों पक्षों के लिए — लेकिन एक matter में सिर्फ एक पक्ष की तरफ से।
Petition, settlement terms, first और second motion।
Divorce petition या बचाव, सबूत और बहस।
Interim और permanent maintenance, alimony और बदलाव।
Custody, guardianship और मिलने के अधिकार।
सुरक्षा और रहने के आदेश — और गलत शिकायतों का बचाव।
Mediation, settlement deed और सारे केस का एक साथ समाधान।
कानून क्या कहता है
Hindu Marriage Act के अलावा Special Marriage Act और पर्सनल कानून भी लागू होते हैं — कौन सा कानून लगेगा, यह शादी के तरीके और धर्म पर निर्भर करता है।
कम से कम 1 साल से अलग रहने पर दोनों की मर्जी से तलाक; 6 महीने का वेटिंग पीरियड कोर्ट माफ कर सकता है।
क्रूरता, 2 साल का अलगाव, व्यभिचार, धर्म परिवर्तन या मानसिक विकार जैसे आधारों पर तलाक का केस।
पत्नी, बच्चे और माता-पिता का maintenance क्रिमिनल कोर्ट से; केस के दौरान अंतरिम maintenance फैमिली कोर्ट से।
सुरक्षा, रहने की जगह, आर्थिक राहत और कस्टडी के आदेश।
बच्चे का हित सबसे ऊपर — कस्टडी, गार्जियनशिप और मिलने का अधिकार।
Maintenance के मामलों में दोनों पक्षों को अपनी आय और संपत्ति का एफिडेविट देना होता है।
ये बातें पहले से जान लीजिए
एक साथ कई FIR और केस — बाद में सेटलमेंट मुश्किल और सालों की कानूनी लड़ाई।
Maintenance के एफिडेविट में गलत जानकारी देना — कोर्ट की नजर में साख खत्म हो जाती है।
ज़ुबानी समझौता — बाद में मुकरना आसान।
Custody में बच्चे का हित court सबसे पहले देखता है; दूसरे parent से दूर रखना उल्टा पड़ता है।
Family court में mediation का मौका — सबसे कम खर्च और कम दर्द वाला रास्ता।
CGA का प्रोसेस
पूरी situation समझना — आपके goals और बच्चों की ज़रूरत।
Settlement या litigation, कौनसा law और कौनसी court।
Petition, reply या settlement terms।
Hearings, mediation और evidence।
Maintenance का execution, custody का पालन और appeals।
Documents
ये लिस्ट तैयार रखिए। फोटो या स्कैन WhatsApp पर भेज दीजिए — original सिर्फ ज़रूरत पर। Case के हिसाब से लिस्ट थोड़ी बदल सकती है।
ज़रूरी
Family matters में हर बात गोपनीय रहती है। हम एक मामले में सिर्फ एक पक्ष की तरफ से काम करते हैं।
अगर आप या बच्चे तुरंत खतरे में हैं तो पहले पुलिस (112) या महिला हेल्पलाइन (181) से संपर्क करिए — कानूनी कार्रवाई उसके साथ चलती है।
कम से कम 1 साल अलग रहने के बाद याचिका दाखिल होती है। First motion के बाद 6 महीने का वेटिंग पीरियड होता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के अमरदीप सिंह जजमेंट के हिसाब से कोर्ट सही मामले में माफ कर सकता है।
कोई तय फार्मूला नहीं है। कोर्ट दोनों की income, ज़रूरत, लाइफस्टाइल और जिम्मेदारियों को देखता है। सुप्रीम कोर्ट ने रजनीश बनाम नेहा मामले में दोनों पक्षों के लिए income और assets का एफिडेविट ज़रूरी किया है।
कोर्ट बच्चे का हित सबसे ऊपर रखता है — उम्र, पढ़ाई, भावनात्मक जुड़ाव और माता-पिता की स्थिति। दूसरे parent को visitation का हक आमतौर पर मिलता है।
हाँ। Family matters की हर जानकारी गोपनीय रहती है और कई मामलों में कोर्ट भी इन-कैमरा सुनवाई करती है।
और भी
यह जानकारी Bar Council of India के नियमों के अनुसार सिर्फ जानकारी के लिए है। यह किसी तरह का विज्ञापन या प्रचार नहीं है। किसी भी मामले का परिणाम कोर्ट या अथॉरिटी तय करती है; CGA किसी परिणाम की गारंटी नहीं देता।
सिर्फ इतना बताइए कि मामला किस बारे में है और कोई केस पहले से चल रहा है या नहीं। बात पूरी तरह गोपनीय रहती है।